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क्या है ग्लोबल साउथ, इसकी मांगें क्या हैं और BRICS देशों के लिए क्यों है इतना अहम?

 Written By: Amar Deep
 Published : Sep 13, 2026 07:06 am IST,  Updated : Sep 13, 2026 07:06 am IST

नई दिल्ली में चल रहे BRICS समिट में ग्लोबल साउथ के मुद्दों को उठाया गया। ब्रिक्स में शामिल ज्यादातर देश ग्लोबल साउथ का हिस्सा हैं। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि ग्लोबल साउथ क्या है और इसकी प्राथमिकताएं क्या हैं?

ब्रिक्स समिट में ग्लोबल साउथ के मुद्दों पर हुई चर्चा।- India TV Hindi
ब्रिक्स समिट में ग्लोबल साउथ के मुद्दों पर हुई चर्चा। Image Source : PTI

नई दिल्ली में आयोजित BRICS समिट में शामिल होने के लिए दुनिया भर के नेता भारत पहुंचे हुए हैं। इस साल भारत BRICS समिट की अध्यक्षता कर रहा है, इसलिए वैश्विक स्तर पर फैसले लेने की प्रक्रिया में विकासशील देशों की आवाज को और मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है। नई दिल्ली घोषणापत्र में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में विकासशील देशों की ज़्यादा भागीदारी की मांग की गई और UN सुरक्षा परिषद तथा वैश्विक वित्तीय ढांचे में सुधार का समर्थन किया गया। इस बीच पिछले कई दिनों से "ग्लोबल साउथ" शब्द सुर्खियों में छाया हुआ है। आइए विस्तार से समझते हैं कि असल में 'ग्लोबल साउथ' क्या है और अभी यह इतना अहम क्यों है।

ग्लोबल साउथ क्या है?

'ग्लोबल साउथ' एक राजनीतिक और आर्थिक शब्द है, जिसका इस्तेमाल ज़्यादातर एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और कैरिबियन के विकासशील और उभरते देशों के लिए किया जाता है। यह कोई तय भौगोलिक श्रेणी नहीं है। ग्लोबल साउथ में शामिल देश उत्तरी गोलार्ध में भी हो सकते हैं। यह शब्द मोटे तौर पर देशों के बीच धन, विकास, ऐतिहासिक अनुभवों और वैश्विक संस्थाओं में उनके प्रभाव के अंतर को दिखाता है, न कि सिर्फ नक्शे पर उनकी जगह को।

खास बात यह है कि इसका मतलब यह भी नहीं है कि इन सभी देशों की राजनीतिक व्यवस्था, विदेश नीति या आर्थिक हित एक जैसे हैं। उदाहरण के लिए, भारत, चीन, ब्राजील, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, सऊदी अरब और मिस्र की प्राथमिकताएं बहुत अलग-अलग हैं। जो बात इनमें से कई देशों को एक साथ लाती है, उनमें वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय शासन को प्रभावित करने वाले फैसलों पर ज़्यादा प्रभाव डालने में उनकी साझा दिलचस्पी शामिल है।

ग्लोबल साउथ क्यों अहम है?

विकासशील देशों की आर्थिक ताकत में जबरदस्त बदलाव आया है। UN ट्रेड एंड डेवलपमेंट (UNCTAD) के अनुसार, 2023 में ग्लोबल साउथ की हिस्सेदारी दुनिया की GDP में 42%, सामान के निर्यात में 44% और विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) के आने में 65% रही है। इसके ज़्यादा प्रतिनिधित्व के लिए सबसे अहम तर्क यह है कि बढ़ती आर्थिक ताकत का असर उन संस्थाओं में उसी अनुपात में नहीं दिखा है, जो बहुत अलग दौर में बनाई गई थीं।

ग्लोबल साउथ की सुधार की मांग के पीछे यह बात है कि ग्लोबल इकॉनमी तो बदल गई है, लेकिन उसे चलाने वाले ढांचे उसी रफ़्तार से नहीं बदले हैं। इसलिए, यह मांग स्वाभाविक रूप से सिर्फ बातचीत की मेज पर ज़्यादा सीटें पाने से कहीं आगे की है। विकासशील देश नियम तय करने में भी अपनी ज़्यादा बड़ी भूमिका चाहते हैं।

ग्लोबल साउथ के लिए BRICS की भूमिका

ब्रिक्स एक बहुत अहम मंच है, जिसके जरिए उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं मिलकर अपना प्रभाव बढ़ा सकती हैं। शुरुआत में ब्राजील, रूस, भारत और चीन से बना यह ग्रुप बाद में दक्षिण अफ्रीका को शामिल करने के साथ और बड़ा हो गया। अब इसमें 11 सदस्य हैं, जिससे इसका भौगोलिक और आर्थिक दायरा काफी बढ़ गया है। रॉयटर्स के मुताबिक, यह ग्रुप दुनिया की 40% से ज़्यादा आबादी और ग्लोबल इकॉनमी के लगभग एक-चौथाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है।

इसकी अहमियत का एक कारण यह है कि यह ऐसे देशों को एक साथ लाता है जिनकी भू-राजनीति (geopolitics) पर राय अलग हो सकती है, लेकिन मौजूदा अंतरराष्ट्रीय आर्थिक और राजनीतिक ढांचे को लेकर उनकी चिंताएं एक जैसी हैं। इस वजह से, ब्रिक्स का मकसद सिर्फ एक अलग ग्रुप बनाना नहीं, बल्कि उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के लिए सामूहिक मोल-भाव की ताकत (collective bargaining power) तैयार करना है।

ग्लोबल साउथ के देश क्या हासिल करना चाहते हैं?

दिल्ली में आयोजित BRICS समिट में कई प्राथमिकताएं साफ तौर पर सामने आईं। इनमें कुछ ऐसी हैं, जिनका प्रभाव दुनिया के कई देशों पर पड़ता है। ग्लोबल साउथ के देशों की प्राथमिकताओं में अहम हैं-

  1. ग्लोबल संस्थाओं में ज़्यादा प्रतिनिधित्व- ब्रिक्स ने UN (जिसमें सिक्योरिटी काउंसिल भी शामिल है) के साथ-साथ IMF और वर्ल्ड बैंक में बड़े सुधारों की मांग की। चीन और रूस ने UN सिस्टम में भारत और ब्राजील की बड़ी भूमिका का समर्थन किया।
  2. ग्लोबल ट्रेड में मजबूत आवाज- नई दिल्ली घोषणापत्र में एकतरफा टैरिफ, संरक्षणवादी उपायों और आर्थिक दबाव की आलोचना की गई। इसके पीछे मुख्य तर्क यह है कि बड़ी ताकतों के फैसलों का बोझ विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर जरूरत से ज़्यादा नहीं पड़ना चाहिए।
  3. ज़्यादा फाइनेंशियल विकल्प- ब्रिक्स अभी किसी एक कॉमन करेंसी को अपनाने की दिशा में नहीं बढ़ रहा है। इसके बजाय, यह लोकल करेंसी में लेन-देन, पेमेंट-सिस्टम की इंटरऑपरेबिलिटी, क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट और न्यू डेवलपमेंट बैंक को मजबूत करने पर ध्यान दे रहा है। समिट में भारत ने डिजिटल पेमेंट सिस्टम को जोड़ने और सेंट्रल बैंक की डिजिटल करेंसी के बीच इंटरऑपरेबिलिटी की संभावना तलाशने का विचार भी रखा।
  4. टेक्नोलॉजी तक पहुंच और आपसी सहयोग- AI, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, क्वांटम टेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर और दूसरी उभरती हुई टेक्नोलॉजी ब्रिक्स के एजेंडे का हिस्सा बन गई हैं। भारत ने अपनी अध्यक्षता का इस्तेमाल टेक्नोलॉजी सहयोग को 'ग्लोबल साउथ' पर केंद्रित करने के लिए किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार इसे "नियम मानने वालों" (rule-takers) से "नियम बनाने वालों" (rule-shapers) की ओर बदलाव के तौर पर पेश किया है, और भारत ने कहा है कि वह इस कोशिश का नेतृत्व करने में मदद के लिए तैयार है। दिल्ली घोषणापत्र इसी सोच को दिखाता है कि UN और फाइनेंशियल संस्थाओं में सुधार करना, ग्लोबल ट्रेड को ज़्यादा निष्पक्ष बनाना, डेवलपमेंट फाइनेंस का दायरा बढ़ाना और यह पक्का करना कि उभरती हुई टेक्नोलॉजी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के भी काम आएं।

ग्लोबल साउथ में भारत की भूमिका

ब्रिक्स समिट में भारत का नजरिया खास रहा है, क्योंकि नई दिल्ली ने ग्लोबल साउथ के एजेंडे को सिर्फ एक ग्लोबल सिस्टम की जगह दूसरा सिस्टम लाने की कोशिश के तौर पर पेश नहीं किया है। नई दिल्ली ने मौजूदा संस्थाओं में सुधार करने और जहां जरूरत हो, वहां नए सिस्टम बनाने की बात कही है। यह नजरिया भारत की ब्रिक्स प्राथमिकताओं में साफ दिखता है। जैसे UN और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में सुधार, तुरंत कोई कॉमन करेंसी लाए बिना लोकल करेंसी में व्यापार को बढ़ावा देना, पेमेंट सिस्टम को जोड़ना, टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाना और मजबूत सप्लाई चेन को बढ़ावा देना।

भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान इन विचारों को व्यावहारिक पहलों में बदलने की भी कोशिश की गई है। इनमें ब्रिक्स MSME पोर्टल और स्टार्टअप इनोवेशन फंड से लेकर डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर सहयोग और AI, क्वांटम और एडवांस्ड सैटेलाइट टेक्नोलॉजी समेत 37 भारतीय डीप-टेक इनोवेशन को प्रदर्शित करना शामिल है।

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